Chhattisgarh’s Local Voice Echoing Today in India – Poet Kanhaiya Lal Mishra

Poetry affects different people in different ways, and can easily do through written words what many conversations fail at – it can heal, inspire, enrage and even spark joy in the darkest of spaces inside you. Poets have a special kind of power that allows them to speak to each and every person on an intimate level and keep you hooked, even if it’s a subject you have little-to-no interest in.

There is a class of contemporary Indian poets who have revived love of poetry in their own unique way. They’ve given voice to a myriad of subjects, from light to heavy.
Chattisgarh, 26th state of India. Chattisgarhi, language and lifestyle. Chattisgarhi is a heart-touching language well known as ‘Gurtur Boli’, a little bit of both, sweet and sour. Music and dance have had immense importance in this culture.
Be it birth or death, in any family, all feelings and emotions are shown through songs and poems. ‘Sua’, ‘Karma’, ‘Danda’, ‘Jasgeet’, ‘Pandwani’ , ‘Panthi’, ‘Jawara’, ‘Suva’, ‘Fag’ , ‘Bans geet’ and many more. Chattisgarhi literature is a treasure of beautiful folklore and tales. Directly or indirectly many have helped to build this literal gem.
One of them is Shri Kanhaiya Lal Mishra. He loved the literature as much as he loved the Chattisgarhi soil. He has given his contribution to almost all sectors of this folklore. So here are some of his works.
Shri Kanhaiya Lal Mishra was born on 3rd March 1939in a small village called Devri in district Bilaspur of Chhattisgarh. His father Pandit Patitpavan Mishra was a well-known Vaidya (Ayurvedic Kaviraj) and his mother was a housewife.

After completing his primary education from the village, he finished his higher education in commerce from CMD College, Bilaspur. He was the president of the student union for consistently four years. He got married to Kanaklata Nanda (from Raurkela, Orrisa) in Jun 1966.
Shri Mishra got retired as Additional General Manager in Jila Sahkari Bank. Later, he got associated with “Chhattisgarh Sahkari Sandesh” monthly magazine as an editor and also become a part of a book called “Bilaspur Jila Ek Parichay” as an editor.
He was associated with poetry, writing and editing throughout his life. He has written many poems and conducted a couple of programs on different occasions. To keep the art and culture alive in Bilaspur district, he had done significant contribution. Time and again, he was given by many awards.
In the year 2005, he was awarded a degree of “Basant Ratna” for the immense contribution in the field of artwork. in the year 2010, he was again awarded for his contribution in the field of art and culture.
On March 10, 2011, Shri Mishra passed away but he left his art and culture footprints to inspire others.
Some of his popular property in Chhattisgarhi is given below.
 

कन्हैया – बाल गोपाल से यशोदा मैया की विनती
सबै गवालिन इक मत हो के चलिन दसोदा द्वार,
बरजो मैय्या तुंहर कन्हैया हुरमत लेईन हमार।
दहिया खा के मटकी फोरय
अउ चीर ल ले गए बटोर,
अंगुरी दबा के उहरो पकड़िस
तन ल दिहिस झझकोर।
बार बार दसोदा कन्हाई ल बरजय
के पर घर के माखन ल झन खाबे
ए बदनामी है मोर लाला
परघर के माखन ल झन खाने
आके सरेहन बद्दी देथें
ग्वालिन गांव भर के,
रद्दा रेंगाई दूलम होगे
मारे तौर डर के – कन्हैया
मारे तोर डर के
आजा समझावौं चिटिक सुन ले धीर धर के
के पनिहारिन के मरकी झन फोरबे
ए बदनामी हे……
जमुना के तीर ग्वालिन मन के
लुगरा ल लुकाए – काहे
लुगरा ल लुकाए
कदंब के उपर बइठ के कइसे
बंसुरी ल बजाए – रे कान्हा
बंसुरी ल बजाए
सुनले कुंवर कहना मोर कान ल लगाके
के बरजोरी सखियन संग झन करबे
ए बदनामी हे मोर लाला
पर घर के माखन ल झन खाबे…

 

तोर बिन – किसानों के पलायन पर खेत खलिहानों की ओर उनके प्रत्यावर्तन के लिए प्रार्थना
परिया परगे खेत ग मालिक
तोर बिन जतन करइया
आजा धर के नांगर बइला
मात गइस क ल इ या
के मोर खेत बो अइ या आ जाबे ना।
रेल वाही के गिट्टी पथरा
कोइलारी के कोइला
मोर सब के धार खियागे
आंखी पर गे गहिला
तय मोर पनिहारीन धीरज धरबे ओ
अवो मोर बोझियारिन विलम लेबे न।
च ट ले जर थे भुइयां के भोमरा
आवत जावत तर इ या
क इ से कट ही ये बदरी दिन
झट आबे मोर कम इया
रे मोर खेत बो अ इ या आ जाबे रे
मोर नागर जोत इ या आ जाबे ना
राव झाव मं बीत गइस दिन
रातिहा ब इ ठे वं कुंदरा
तोर बिन राधा मोर मन तड़पय
उचत ग इ स हे निदिया रे
मोर लोरी गव इ या गावत रहिबे ना
तय मोर पनिहारिंन धीरज धरबे रे

 

मोर सिपाही मोर किसान – जय जवान जय किसान की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए जवानों और किसानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की प्रार्थना
सुमिरन करके चारों धाम ल , आज सुनावौं बात
चिटि कुन सुन तो लेवा कुछु गुन तो लेवा
सीमा मं जवान खड़े हे तान के अपन छाती
खड़े मंझनियां घुप काला के , का सरदी के राती,
झड़ी बादर ल वो जानै अपन संगी जात
चिटिकुन सुन तो लेवा……
कल कारखाना दफतर वाले मन बर हे बड़काम,
जांगर ल झन तुमन चोराहव झन करिहव अकाम
आठ के बदला बारा घंटा तुमन चलाहव हाथ
चिटिकुन सुन तो लेवा……
ओकर मुरवा मं बांधे हस तैं राखी के डोरी,
तोर मांग के सेंदुर चमकय ओकरे बल मं गोरी
नौ महीना तैं पेट मं राखे तोर रहिस बड भाग
चिटिकुन सुन तो लेवा…….
मुंड मं पागा , कांध मं नांगर हाथ मं बइला के डोर
आवत होही तोर कमइलिन थोरकुन लेबे अगोर
खेत खार के मोर सिपाही जै हो तोर किसान
चिटिकुन सुन तो लेवा…….

 

टोली के बोली – गांव की ठेठ होली की मस्ती की झांकी| आज़ हम जिस स्वतंत्रता का राग पश्चिम का अंधानुकरण कर गा रहे हैं वो हमारी संस्कृति में बहुत पहले से सभ्यता के दायरे में रहते हुए है|
खाई के माते हे भांग इहां सब
होरी ये गोरी न देबे तैं गारी
सुन्ना गली के गुजर न गुजरिया
सननन चलत हवय पिचकारी
ये तो फागुन के महीना
कुछु ले के जाबे चिन्हा
अरे सुन ले ये टोली के बोली
गोरी आबो ले के डोली रे।
तोर गुरतुर बोली
अउ हांसी ठिठोली मं
माते हे रे मन मोर
जइसे सेमहर फूले आमा मउरे
टेसू खिले लटझोर
काहे तान के रेंगे सीना
कुछु ले के जाबे चिन्हा
आज सुन ले ये टोली के बोली बही
आबो ले के टोली रे।
मोर गुलाल के रंग दिखय
जइसे तोर गुलाबी हे गाल
लाज सरम सब छोड़ दे रे
गोरी होए दे रे जमके धमाल
काहे चुहय अभी ले पसीना
कुछु लेके जाबे चिन्हा
आबो सुन ले ये टोली के बोली जिया
आबो ले के डोली रे।

 

चंदा के अंजोरी ( लोरी) – बेटी के प्रति पिता का स्नेह दर्शाती लोरी
चंदा के अंजोरी तोर अंगना मं
तोर अंगना मं बेटी मोर
गावथंव मैं लोरी सोजा दसना मं
मोर दुलउरिन सोजा तैं कोरा मा आंखी मूंद के
रात घलव मोटियारी होगे लोरी ल मोर सुन के
आहैं राजा रानी तोर सपना मं
तोर सपना मं पिरोहिल मोर
चंदा के अंजोरी……..
छउंकत जाथे तेल दिया के कब तक बाती बरही
असरोए गावत हौं लोरी नींद ह कब तोर परही
मैं असरोए गावत हौं लोरी नींद ह कब तोर परही
देख सोगे सुआ कलेचुप पिंजरा मं
सोगे पिंजरा मं दुलौरिन मोर
चंदा के अंजोरी………
बालकपन तोर बने बिहनियां मंझन खरे जवानी
ढरकत जाथे रात वो बेटी सुन मोर करम कहानी
एदे ढरकत जा थे रात वो बेटी सुन ले करम कहानी
आज निरधन के पूछारी नइ ए दुनिया मं
रे बइरी दुनियां मं दाई मोर
चंदा के अंजोरी…….

 
 

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